आज जब हम चारो और देखते है तो हर और लोग एक दूसरे को अजीब तरह से देखते है । हर और अशांति और डर का माहोल है । लोग हर अजनबी को आतंकवादी और वहसी दरिंदा समज रहे है। हम कैसा समाज बना रहे है।
जब देश आजाद हुआ था तब महात्मा गाँधी और पंडित नेहरु ने क्या सोचा था - क्या इसी समाज के लिए आजादी की जंग हुई थी ? यदि आज ये लोग जिन्दा होते तो क्या सोचते ?आज लडाई आम आदमी और ख़ास आदमी की है.
खास लोग अपराध नही , अपराधी की जात पूछ रहे है . अगर वह दूसरी जाती का है या दूसरे धरम का है तो धर्म युद्ध का मूड बने.यदि किसी दल का है तो चुनावी तयारी करते हुए सड़क घेरें . कुछ सियासी लोग ही कहते है अपराध मैं सियासत हो रही है. कुछ मामला दर्ज होते ही पुलिस की गर्दन लपकने दौडते है.पुलिसवाले पसीना पोछ्ते हुए इन नेताओं के चेहेरे देखतेहै और उनकी न्युसेन्स को तोलते है . आम लोग गम पी लेते है . उत्तरकाशी की उस लड़की की तरह जिसे बलात्कार के बाद गंगा मैं फ़ेंक दिया था. दरअसल ख़ास लोग बहुत हो गए है . ऐसे मैं पुलिश वाले आम आदमी के लिए समय निकले भी तो कैसे. लोग आज भी खुले मैं सब कुछ खेल रहे है । पहले जिस काम को सबसे छिपा कर किया जाता था , आज वह सबके सामने बड़ी शान से किया जाता है । क्योंकि उन्हें अपना सरपरस्त दिखता है , पहले लोग भगवान से डरते थे आज लोग उस से डरते है जिसका कोई गोडफादर होता है।
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